इस घटनाक्रम से संकेत मिलता है कि जहां एक ओर असंतुष्ट नेता संगठनात्मक बदलाव की तैयारी में जुटे थे, वहीं दूसरी ओर ममता बनर्जी ने पार्टी संगठन पर अपने दावे को मजबूत करने के लिए पहले ही कदम उठा लिया था।
ममता खेमे के एक वरिष्ठ नेता ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘जब बागी गुट अपनी राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन की तैयारी कर रहा था, तब तक ममता बनर्जी पार्टी अध्यक्ष के रूप में संगठनात्मक ढांचे को अंतिम रूप देकर उसकी सूची निर्वाचन आयोग को भेज चुकी थीं।’’
ममता बनर्जी के प्रति निष्ठा रखने वाले नेताओं के अनुसार, पार्टी की नेतृत्व संरचना और 24 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति को शनिवार को अंतिम रूप दिया गया था और इसकी सूची सोमवार दोपहर निर्वाचन आयोग को सौंपी गई। यह कदम विपक्ष के नेता ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले असंतुष्ट गुट के कोलकाता में विशेष अधिवेशन आयोजित करने से पहले उठाया गया।
यह खुलासा ऐसे समय में हुआ है जब एक दिन पहले बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाने, वरिष्ठ विधायक अरूप रॉय को नया अध्यक्ष चुनने और 30 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन की घोषणा की थी। इससे पार्टी के भीतर संगठनात्मक विभाजन और गहरा हो गया है।
ममता खेमे के सूत्रों ने बताया कि निर्वाचन आयोग को भेजी गई नई समिति की संरचना पहले की संगठनात्मक व्यवस्था से अलग है और इसमें असंतुष्ट गुट से जुड़े कई नेताओं को शामिल नहीं किया गया है।
उन्होंने कहा कि इसी महीने गठित राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य रहे अरूप विश्वास का नाम भी संशोधित पैनल से हटा दिया गया है।
एक अन्य कदम के तहत पार्टी की अनुशासन समिति ने फिरहाद हकीम, अरूप विश्वास, अरूप रॉय, जावेद खान, रथिन घोष, बिप्लब मित्रा, स्नेहाशीष चक्रवर्ती और सबीना यास्मीन सहित कई वरिष्ठ नेताओं को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में कारण बताओ नोटिस जारी किया है।
वरिष्ठ टीएमसी नेता और विधायक कुणाल घोष ने कहा, ‘‘यह एक हास्यास्पद नाटक है। जिस व्यक्ति को तृणमूल से निष्कासित किया जा चुका है, वह विशेष अधिवेशन आयोजित कर रहा है। मामला अदालत में है और हमें न्याय मिलने का भरोसा है। हम ऐसे हास्यास्पद व्यवहार को कोई महत्व नहीं देते। टीएमसी का मतलब ममता बनर्जी है, बाकी सब तमाशा है।












