वरिष्ठ अधिवक्ता के.के. वेणुगोपाल ने हिरासत में लिए जाने की एक घटना का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें कई नियमों का उल्लंघन हुआ। उन्होंने बताया कि संबंधित महिला को बिना पहचान बैज वाले पुलिसकर्मियों ने पकड़ा और दूसरी जगह ले जाकर छोड़ दिया।
जस्टिस जे. बागची ने कहा कि राज्य सरकार को यह बताने का अवसर दिया जाना चाहिए कि कथित हिरासत किन परिस्थितियों में हुई, किस तरीके से हुई और इसके पीछे क्या औचित्य था।
एक वरिष्ठ अधिवक्ता ने SIR मामले के लंबित होने का उल्लेख किया। इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि न्याय प्रशासन में हस्तक्षेप हुआ है या नहीं, यह तय करने का पहला अधिकार अदालत का है।
सॉलिसिटर जनरल ने अगली सुनवाई बुधवार को रखने का अनुरोध किया, लेकिन जस्टिस बागची ने कहा कि मामले को मंगलवार को ही सुना जाएगा और तब तक अंतरिम जवाब दाखिल किया जाए। उन्होंने कहा कि अदालत पहले ही आदेश पारित कर चुकी है।
अदालत के आदेश में क्या कहा गया?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक, 9 अक्टूबर 2026 के पहले के आदेश के उल्लंघन और 10 अक्टूबर को दिल्ली में बड़ी संख्या में लोगों को कथित तौर पर अवैध रूप से हिरासत में लिए जाने के आरोपों से जुड़ी तत्काल अर्जियों पर सुनवाई के लिए अदालत बैठी थी।
आदेश में कहा गया कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं और वकीलों ने अदालत को बताया कि उसके निर्देशों का खुले तौर पर उल्लंघन हुआ। उनके अनुसार, मेट्रो रेल सेवाएं नहीं चल रही थीं और नई दिल्ली तथा हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन बंद रहे। यातायात संबंधी कोई एडवाइजरी जारी नहीं की गई और बड़ी संख्या में लोगों को परेशान किया गया तथा निषेधाज्ञा के दायरे से बाहर भी कथित तौर पर अवैध हिरासत में लिया गया।
अदालत के सामने यह भी दलील दी गई कि इंटरनेट पूरी तरह बंद था और शहर में कर्फ्यू जैसे हालात थे। परिवहन सेवाएं बाधित थीं तथा लोगों और सामान की स्वतंत्र आवाजाही पर रोक जैसी स्थिति बनी हुई थी।













