जैन समुदाय के एक याचिकाकर्ता ने भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा करते हुए मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय से बुधवार को गुहार की कि समुदाय को इस स्मारक में उपासना का अधिकार प्रदान किया जाए।
दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सलेक चंद जैन ने यह जनहित याचिका ऐसे वक्त दायर की, जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षित स्मारक के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर हिंदू और मुस्लिम पक्षों के दायर मुकदमे उच्च न्यायालय में पहले ही विचाराधीन हैं। हिंदू पक्ष एएसआई के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आधार पर दावा कर रहा है कि यह स्मारक मूलत: एक मंदिर है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद करार दे रहा है।
जैन के वकील दिनेश पी. राजभर ने इंदौर पीठ के न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता के सामने एएसआई के 2003 के एक आदेश को चुनौती दी। इस आदेश के तहत विवादित स्मारक में हर मंगलवार को हिंदुओं और हर शुक्रवार को मुस्लिमों को उपासना की अनुमति दी गई है। राजभर ने दावा किया कि भोजशाला परिसर में कभी जैन मंदिर और गुरुकुल हुआ करता था।
उन्होंने भारतीय संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप पर जोर देते हुए कहा,‘‘देश के संविधान के तहत जैन धर्म के अनुयायियों को भोजशाला परिसर में पूजा का अधिकार है।’’ राजभर ने तर्क दिया कि धार के राजा भोज हिंदू और जैन, दोनों धर्मों के विद्वानों के संरक्षक थे।













