दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि यह बड़ी विडंबना है कि राहुल गांधी को छुआछूत के खिलाफ कार्रवाई की मांग करने को लेकर अत्याचार का मामला झेलना पड़ रहा है। उन्होंने बताया कि खड़गे को ‘नफरत भरी जातिवादी सोच’ का सामना करना पड़ा था, जब उत्तराखंड के हल्द्वानी में रामलीला मैदान में उनके भाषण के बाद एक ‘शुद्धीकरण हवन’ (शुद्धि अनुष्ठान) किया गया था और राहुल गांधी ने इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ़ प्राथमिकी दर्ज करने की मांग की थी।उन्होंने पूछा, ‘‘छुआछूत की प्रथा के खिलाफ न्याय की मांग करने को अत्याचार कैसे माना जा सकता है?’’
दीपांकर भट्टाचार्य ने कहा कि मनुस्मृति की राहुल गांधी की आलोचना से मीडिया के कुछ वर्गों में ‘बेचैनी और मज़ाक’ की स्थिति भी पैदा हुई थी। उन्होंने कहा, ‘‘मनुस्मृति को गुलामी की पितृसत्तात्मक एवं जातिवादी संहिता और संस्थागत या रस्मी अन्याय की संहिता बताने को चुनिंदा ‘हिंदू-विरोधी पूर्वाग्रह’ के तौर पर पेश किया जा रहा है।
बी.आर. आंबेडकर द्वारा 1927 में मनुस्मृति जलाये जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि संविधान को अपनाना उस सामाजिक व्यवस्था को स्पष्ट रूप से नकारना था जो इस ग्रंथ से जुड़ी थी। भट्टाचार्य ने यह भी आरोप लगाया कि राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ (आरएसएस) ने अतीत में संविधान का विरोध किया था और भारत के संवैधानिक आधार के तौर पर मनुस्मृति का समर्थन किया था।













